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माँ मनसा पूजा

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एकादशी व्रत और इसके नियम

हिंदू पंचांग  की ग्यारहवी तिथि  को एकादशी कहते हैं। यह तिथि महीने  में दो बार आती है। पूर्णिमा  के बाद और अमावश्या के बाद। पूर्णिमा के बाद आने वाली एकादशी को कृष्णपछ की एकादशी और अमावस्या के बाद आने वाली एकादशी को शुक्लपछ  की एकादशी कहते हैं। इन दोने प्रकार की एकादशियों का भारतीय सनातन संप्रदाय में बहुत महत्त्व है।सभी धर्मों में व्रत-उपवास करने का महत्व बहुत होता है। साथ ही सभी धर्मों के नियम भी अलग-अलग होते हैं। खास कर हिंदू धर्म के अनुसार एकादशी व्रत करने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को दशमी के दिन से ही कुछ जरूरी नियम का पालन करना चाहिए
व्रत:- एकादशी व्रत करने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को दशमी के दिन से कुछ अनिवार्य नियमों का पालन करना पड़ेगा। इस दिन मांस, प्याज, मसूर की दाल आदि का निषेध वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। रात्रि को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए तथा भोग-विलास से दूर रहना चाहिए। एकादशी के दिन प्रात: लकड़ी का दातुन न करें, नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और उँगली से कंठ साफ कर लें, वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी ‍वर्जित है। अत: स्वयं गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करें। …

शिव का सावन

हर हर महादेव ,भोलेनाथ ,शम्भू ,त्रिकाल और त्रिकाल न जाने कितने नामों से लोग भगवान् शिव को  पूजते है जानते है। अभी सावन का महिना चल रहा यानि भगवन शिव का महिना ... शास्त्रों में तथा हिंदुओ के लिये बहुत पावन महिना ‍माना गया है .

भगवान शिव :-शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। वे अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। वे स्वयं द्वंद्वों से रहित सह-अस्तित्व के महान विचार का परिचायक हैं। ऐसे महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है शिवरात्रि। क्यों की जाती है सावन में शिव की पूजा ? :- इस महीने में शिव जी की पूजा का विशेष महत्व बताया जाता है। कहा जाता है कि सावन की महीने में सोमवार के दिन शिव जी की पूजा करने से शिव जी खुश होते हैं। क्योंकि सोमवार का स्वामी शिव जी हैं। सावन का महीना शिव जी का …

रावण की पूजा

रावण ,रामायण का एक प्रमुख किरदार जो अपने दसों सिर के लिये जाना जाता है ,रावण को बहुत क्रूर , ,सशक्त खलनायक के रूप में देखते है ,परन्तु आज हम उनके एक प्रतापी राजा और उसके अच्छाई
को आपलोगों के सामने विस्तार से चर्चा करेंगे..
मान्यतानुसार रावण में अनेक गुण भी थे। वह एक कुशल राजनीतिज्ञ , महापराक्रमी , अत्यन्त बलशाली , अनेकों शास्त्रों का ज्ञाता प्रकान्ड विद्वान पंडित एवं महाज्ञानी था। रावण के शासन काल में लंका का वैभव अपने चरम पर था इसलिये उसकी लंकानगरी को सोने की लंका अथवा सोने की नगरी भी कहा जाता है।
रावण मे कितना ही राक्षसत्व क्यों न हो, उसके गुणों विस्मृत नहीं किया जा सकता। ऐसा माना जाता हैं कि रावण शिव भगवान का बड़ा भक्त था। वह महा तेजस्वी, प्रतापी, पराक्रमी, रूपवान तथा विद्वान था।बाल्मीकि  उसके गुणों को निष्पक्षता के साथ स्वीकार करते हुये उसे चारों वेदों का विश्वविख्यात ज्ञाता और महान विद्वान बताते हैं। वे अपने रामायण में हनुमान का रावण के दरबार में प्रवेश के समय लिखते हैं अहो रूपमहो धैर्यमहोत्सवमहो द्युति:।अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता॥ आगे वे लिखते हैं "रावण को देखते ही रा…